Wednesday, February 10, 2021

देश के PSUs की बिकवाली पर भाजपा के सांसदों द्वारा मेज का थपथपाना : Mohammed Irfan

जिस वक्त संसद में, रेल, सड़क, बिजली, पानी, LIC, एयरपोर्ट की बोली लगाई जा रही थी उस वक़्त संसद में भाजपा के सांसद ज़ोर-ज़ोर से मेज़ थपथपा कर देश बिकने की खुशी ज़ाहिर कर रहे थे। दरअसल, समस्या ये है कि जनता सुप्त है, वे सरकार से सवाल करना ही नहीं चाहती। वरना होना तो ये चाहिए था कि हर लोकसभा की जनता अपने क्षेत्र के सांसद की कॉलर पकड़ कर आंख में आंख डाल कर सवाल पूछे कि बताओ ये सब क्यों बेचा? इन सबको निजी हाथों में क्यों दिया? गारंटी देता हूँ कि जिस दिन आप ये शुभ कार्य कर डालते, तो यकीन मानिए ये सांसद उस दिन मेज नहीं नरेंद्र मोदी के गाल बजा रहे होते।

लेकिन अवाम सुप्त है, 2014 के बाद धर्म के नशे में मुलव्विस होकर उसने अपने हुक़ूक़ों को पशे पुश्त कर दिया। ये चुप्पी आपके ग़ुलाम होने की गारंटी है, जिसे नरेंद्र मोदी और उसके 303 चेहरे बड़े ही बेहतर ढंग से जानते हैं। कोरोना के वक़्त ही ताली, थाली और दिए न जलाते और सरकार से कड़े बंदोबस्त की मांग करते तो शायद आज हम कोरोना से मुक्त हो चुके होते   कोरोना काल में जहाँ ग़रीब मज़दूरों को कुछ नक़दी की मदद दरपेश थी, तो उन्हें 'लोन' जैसी बीमारी दी गयी, उन्हें खाने की ज़रूरत थी तो सरकार ने 5 किलो आटा और 1 किलो चना प्रति महीना दिया, और अवाम ने इस "भीख" को क़ुबूल कर अपनी चुप्पी दिखाकर नरेंद्र मोदी के खोखले अहम को आसमान की बुलंदी पर पहुंचा दिया। आपकी इन्हीं चुप्पी और सुस्त रवैय्ये का फायदा उठाकर आपके ही क्षेत्र के सांसद आज देश बिकने पर तालियां और मेज थपथपा कर अपनी खुशी और आपकी ग़ुलामी पर अट्टाहस कर रहा है।

नरेंद्र मोदी के इसी अहम और बेख़ौफ़ इरादों ने उसे काले किसान बिल-2020 लाने की सनक भर दी, बस फिर वही, संसद, वही सांसद जो मोदी के हर बेतुके और तानाशाही कानूनों पर मेज ठोकते हैं, मौजूद हैं, सदन की कार्यवाही आरम्भ है, बिल पेश किया जाता है, हाबड़तोड़ लोकसभा से राज्यसभा पास किया जाता है (अलोकतांत्रिक तरीके से) और रब स्टैम्प उस पर हस्ताक्षर करता है उसे कानून की शक्ल देने के लिए। लेकिन ये क्या, इस बार किसान भड़क उठे, दामोदर दास मोदी के लड़के का अहम चूर होने की बारी आई, किसानों ने दिल्ली घेर ली। जैसे चीन का नाम लेने की हिम्मत नहीं हुई इसी तरह एक बार भी किसानों से बात करने की हिम्मत नहीं हुई। 56" गुब्बारे की हवा निकल रही है, दम्भ टूट रहा है।

उठो, उठ कर लड़ सको तो बेहतर है, वरना किस्मत ने तुम्हारी पेशानी पर "ग़ुलाम" तो लिख ही दिया है।

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