सुप्रीम कोर्ट हर ग़ैर-क्षेत्राधिकार मुद्दे पर अपनी टिप्पणी देकर खुद पर एक सवालिया निशान लगा लेता है। ताज़ा मामला कल का ही है कि कल किसानों के मुद्दे (जो कि सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं है, राफ़ेल मुद्दा भी उदाहरण है) जिसमें वे तीन काले कृषि कानूनों की वापसी को लेकर कमोबेश पिछले 50 दिनों से आंदोलनरत हैं।
बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस बोबड़े इन तीन काले कृषि कानूनों को स्थगित करने का निर्णय सुनाते हैं, जबकि ये मुद्दा सरासर सरकार और जनता के बीच का है। ठीक अगले दिन मंगलवार को जस्टिस बोबड़े कहते हैं कि हम एक कमेटी का गठन कर देंगे जो किसानों से इस मुद्दे पर बात करेगी।
अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर.....
जस्टिस बोबड़े ने 4 लोगों की एक समिति बनाई (ये बात अलग है कि समिति बनाने के लिए जस्टिस बोबड़े ने ना समय निर्धारित किया ना ही राय-शुमारी की)। कायदे से जस्टिस बोबड़े वक़्त देते, सरकार से समिति में शामिल करने के लिए एक्सपर्ट्स के सुझाव माँगते। वगैरह, वगैरह! अदालत की सुनवाई होते ही जस्टिस बोबड़े ने जल्दबाज़ी में 4 नामों का ऐलान कर दिया, (ये 4 नाम वही हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान के प्रतिष्ठित अखबारों में इन्हीं काले कानूनों के पक्ष में बड़े बड़े आर्टिकल लिखे हैं) ख़ैर!
अब मेरा सवाल....जस्टिस बोबड़े को इतनी जल्दी क्या थी समिति बनाने की? क्या ये 4 नाम पहले ही निर्धारित हो चुके थे सरकार की तरफ से, जिसे सिर्फ जस्टिस बोबड़े को पढ़ना था? क्या सुप्रीम कोर्ट की साख इतनी गिरा दी गयी है, कि आनन-फानन में मनचाहे फ़ैसले सुनाने हैं (न्याय की तो बात ही छोड़ दीजिए)। जस्टिस बोबड़े ने किस अधिकार का प्रयोग करते हुए इस मुद्दे पर सुनवाई की है?
यदि मान लीजिए कल को किसान इन समितियों "को" नहीं मानेंगे तो आप ही इन किसानों पर "कोर्ट की अवमानना" का केस चलवा देंगे। ऐसा क्यों माननीय?
फिर भी मैं कहूँगा कि पतलून सम्भालो बाबू भैया.....गिरती पतलून ज़मीन को छू रही है, कहीं ऐसा ना हो कि बाबू भैया "नँगे करार" दे दिए जाएं।
~@mirfanINC
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